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आईटीएस 6थ वॉव ने 'विश्व महा जलप्रलय सभ्यता – मत्स्यावतार सभ्यता' पर अभिनव शोध रूपरेखा प्रस्तुत की
NEWS   Jun 26,2026 03:08 pm
हैदराबाद: विश्व इतिहास दिवस 2026 के अवसर पर हैदराबाद स्थित संस्था आईटीएस 6थ वॉव (ITS 6TH WOW) ने 'जय मत्स्यावतार अभियान' के तहत हैदराबाद प्रेस क्लब में "विश्व महा जलप्रलय सभ्यता – मत्स्यावतार सभ्यता" विषय पर एक अभिनव शोध प्रस्तुति का अनावरण किया। यह शोध प्रस्तुति संस्था के महासचिव रविंद्रजीत द्वारा तैयार की गई है। इसमें सिंधु घाटी सभ्यता तथा विश्व की विभिन्न प्राचीन संस्कृतियों में वर्णित महाप्रलय कथाओं के बीच संभावित सांस्कृतिक, पुरातात्विक एवं सभ्यतागत संबंधों का बहुआयामी अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। संस्था ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्तुति किसी अंतिम ऐतिहासिक निष्कर्ष का दावा नहीं करती, बल्कि एक शोध परिकल्पना (Research Hypothesis) है, जिसका उद्देश्य विद्वानों के बीच वैज्ञानिक चर्चा, बहुविषयक अनुसंधान और प्रमाण-आधारित अध्ययन को प्रोत्साहित करना है। प्राचीन सभ्यताओं पर नया दृष्टिकोण प्रस्तुति में मनु, नूह (Noah), नूह (इस्लामी परंपरा), उत्नापिष्टिम, ज़ियूसुद्रा, ड्यूकैलियन आदि से जुड़ी विश्वभर की महाप्रलय कथाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया। इसमें यह देखा गया कि इन कथाओं में दैवीय चेतावनी, जीवन की रक्षा, नौका निर्माण, महाप्रलय से बचाव, पुनर्वास और कृतज्ञता जैसे अनेक समान तत्व मिलते हैं। शोध के सात प्रमुख स्तंभ प्रस्तावित शोध ढांचा निम्नलिखित सात बिंदुओं पर आधारित है: चयनित उद्धारकर्ता (The Chosen Saviour) उद्धारकर्ता नगर (The Saviour City) नौका नगर (The Ark City) सात ऋषि (The Seven Wise Men) सात ऋषियों के नगर (The Seven Wise Men Cities) अवतरण स्थल (The Landing Site) यज्ञ एवं कृतज्ञता परंपरा (Sacrifice and Thanksgiving Tradition) शोधकर्ताओं का मानना है कि ये सात तत्व विश्व की विभिन्न प्राचीन सभ्यताओं की जलप्रलय परंपराओं के तुलनात्मक अध्ययन के लिए एक साझा ढांचा प्रदान करते हैं। धोलावीरा को 'उद्धारकर्ता नगर' के रूप में प्रस्तावित किया गया प्रस्तुति में गुजरात स्थित धोलावीरा को संभावित प्रशासनिक, जल प्रबंधन और ज्ञान संरक्षण केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसकी उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली, सुव्यवस्थित नगर योजना तथा भौगोलिक स्थिति को आगे के शोध हेतु महत्वपूर्ण बताया गया। लोथल और प्राचीन समुद्री विरासत विश्व के सबसे प्राचीन ज्ञात गोदी (Dockyard) वाले लोथल को भी शोध में विशेष महत्व दिया गया। प्रस्तुति में सुझाव दिया गया कि महाप्रलय परंपराओं से जुड़े समुद्री संरक्षण प्रयासों में लोथल की महत्वपूर्ण भूमिका रही हो सकती है, हालांकि इसे भविष्य के पुरातात्विक अनुसंधान का विषय बताया गया है। मत्स्यावतार और सिंधु घाटी सभ्यता शोध का एक प्रमुख बिंदु सिंधु सभ्यता की मुहरों एवं कलाकृतियों में बार-बार दिखाई देने वाले मछली प्रतीक की नई व्याख्या है। प्रस्तुति में कहा गया कि यह प्रतीक संभवतः मत्स्यावतार परंपरा से जुड़ी सांस्कृतिक स्मृति का संकेत हो सकता है, जिसमें मानवता को महाप्रलय की पूर्व चेतावनी देकर जीवन की रक्षा की जाती है। इसी आधार पर शोधकर्ताओं ने भविष्य के शैक्षणिक अध्ययन के लिए "मत्स्यावतार सभ्यता" शब्द का वैचारिक प्रस्ताव रखा है। वैश्विक महाप्रलय परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुति में वैदिक, मेसोपोटामिया, बाइबिल, इस्लामी, फ़ारसी, यूनानी तथा अन्य प्राचीन परंपराओं की महाप्रलय कथाओं का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया। इनमें दैवीय हस्तक्षेप, जीवन की रक्षा, पवित्र नौका, महाप्रलय के बाद प्रवास तथा धन्यवाद परंपराओं जैसी समानताओं को रेखांकित किया गया। वैज्ञानिक सहयोग का आह्वान आईटीएस 6थ वॉव ने दोहराया कि "मत्स्यावतार सभ्यता" केवल एक शोध प्रस्ताव है, स्थापित ऐतिहासिक सत्य नहीं। संस्था ने पुरातत्वविदों, इतिहासकारों, अभिलेख विशेषज्ञों, समुद्री पुरातत्वविदों, भूवैज्ञानिकों, पुरा-जलवायु वैज्ञानिकों, संस्कृत विद्वानों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) विशेषज्ञों तथा अन्य शोधकर्ताओं से इस अवधारणा का वैज्ञानिक परीक्षण, मूल्यांकन और विस्तार करने का आग्रह किया। भविष्य के अनुसंधान के प्रमुख क्षेत्र सिंधु लिपि का रहस्योद्घाटन हड़प्पा सभ्यता में मछली एवं समुद्री प्रतीकों का अध्ययन प्राचीन बाढ़ के भूवैज्ञानिक प्रमाण लोथल की समुद्री तकनीक एवं गोदी का अध्ययन धोलावीरा की जल प्रबंधन प्रणाली वैश्विक महाप्रलय परंपराओं का तुलनात्मक विश्लेषण पुरातत्व एवं भूविज्ञान के पारस्परिक संबंध हड़प्पा सभ्यता और बाद की भारतीय परंपराओं के बीच सांस्कृतिक निरंतरता रविंद्रजीत का वक्तव्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आईटीएस 6थ वॉव के महासचिव रविंद्रजीत ने कहा, "मत्स्यावतार सभ्यता की यह रूपरेखा पुरातत्व, प्राचीन साहित्य, सांस्कृतिक स्मृतियों और वैश्विक महाप्रलय परंपराओं के बीच एक नए संवाद की शुरुआत करने का प्रयास है। हमारा उद्देश्य अंतिम निष्कर्ष देना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन और स्थायी कथाओं में से एक—जीवन, संरक्षण और सभ्यता की निरंतरता—पर सामूहिक शोध को प्रोत्साहित करना है।" कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख अतिथि प्रेस वार्ता में एचआरसी काउंसिल तेलंगाना के अध्यक्ष विजय, प्रख्यात तंत्र-ज्योतिष विद्वान डॉ. चिंता रुक्मांगदा राव, श्री श्री सुरेश आत्माराम गुरुजी, आईटीएस 6थ वॉव के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष किशोर कुमार पुल्ला, भारत अध्यक्ष श्रीनिवास रेड्डी कोंडकिंडी, तेलंगाना अध्यक्ष कलाधर वल्लम, अध्यक्ष जाह्नवी साहित्यी, उपाध्यक्ष क्रांति कुमार, महासचिव रविंद्रजीत, जय मत्स्यावतार अभियान के संस्थापक सदस्य मनीष, अंकन्ना, किशोर तथा धर्म स्थापना के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन प्राचीन सभ्यताओं के अध्ययन में पुरातत्व, इतिहास, पर्यावरण विज्ञान और आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से वैश्विक स्तर पर सहयोग बढ़ाने की अपील के साथ हुआ।

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